राजनीतिक अहंमात्रवाद:

दुःख महिम्न स्तोत्र 
दुःख की स्तुति और महिमा: अगर साम्प्रदायिकता खत्म हो जाये तो नेता खत्म हो जायेंगे। अगर दंगे फसाद खत्म हो जाए तो पुलिस खत्म हो जायेगी। जनता चोटिल नहीं होगी तो डॉक्टर खत्म हो जायेंगे।
पुलिस केस नहीं होगा तो वकील खत्म हो जायेंगे। वकील खत्म हो जायेंगे तो जज कैसे पैसा कमायेंगे?इसलिए, राजनीतिक अहंमात्रवाद के अनुसार सभी अपने ही अस्तित्व में विश्वास रखते हैं।अहंमात्रवाद के अनुसार किसी और की मुसीबत में ही मेरी बरक्कत है। अतः मुसीबतें बरकरार रखी जानी चाहिए।
दुःख की स्तुति एवं महिमा: हमारा अस्तित्व आपसी निर्भरता का है। लेकिन यह निर्भरता दूसरों के दुःख से सम्बन्धित है। दूसरों के दुःख में ही हमारा सुख निहित है। अतः समाज में दुःख हमेशा बना रहना चाहिए। भगवान ने इसीलिए सबको दुःखी बनाया है ताकि उसके दुःख से दूसरा व्यक्ति सुखी हो सके। हम दूसरों के दुःख को देखकर आनंदित होते हैं। दुःख नहीं होगा तो ज्योतिषी बेकार हो जाएंगे।
पंडितों का अस्तित्व भी दुःख से ही है। दुःखी व्यक्ति ही ज्यादा पूजा पाठ कराते हैं। बिमारियां न हों तो डॉक्टर खत्म हो जायेंगे। भगवान ने इसीलिए सबकुछ सोच समझ कर बनाया है। लोग कहते हैं कि भगवान की बनायी दुनिया में इतनी बुराइयां क्यों हैं? परन्तु हर बुराई किसी न किसी के लिए अच्छी है। इसीलिए हमारा अस्तित्व परस्पर निर्भरता का है। इसी परस्पर निर्भरता की वजह से आपसी सौहार्द बना रहता है। एकमात्र दार्शनिक एवं योगी ही है जो दुःख के समूल नाश की बात करता है। इसीलिए कोई दर्शन शास्त्र नहीं पढ़ना चाहता है। दुःख से संसार है। राजनीतिक अहंमात्रवाद: दुःख नहीं होगा तो लोग कर्म भी क्यों करेंगे? जैसे देवतागण कर्म नहीं करते और पुण्य खत्म होने पर वापस मर्त्य लोक में आ जाते हैं। लोग अज्ञानी नहीं होंगे तो शिक्षक क्या करेंगे?
इसलिए समाज में अज्ञान हमेशा बरकरार रहना चाहिए। अतः राजनीतिक अहंमात्रवाद के अनुसार दुःख हमारे अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यही प्रैगमेटिस्म अर्थात व्यावहारिकतावाद है।
हम हमेशा दुःख की कामना करते हैं, अपने नहीं, दूसरों के। अतः सामूहिक रुप से ईश्वर के पास दुःख की इतनी मन्नतें आती हैं कि ईश्वर को दुःख का अस्तित्व बनाए रखना पड़ता है। दुःख हम सब की सामूहिक प्रार्थना है। ऐसे में ईश्वर इससे इन्कार नहीं कर सकते। चार्वाक भी कहता है कि दूसरों को दुखी करके भी अपनी मौज मस्ती में रहो। आज का समाज इसी को अपना आदर्श मानता है।
गौतम बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य इत्यादि ने दुःख के मूल को समाप्त करने की शिक्षा दी। लेकिन लोगों ने उन्हें नकार दिया। लोगों का विश्वास दुःख दूर करने में है, दुःख का कारण दूर करने में नहीं। अतः इस दुःख के अस्तित्व से ही हमारा अस्तित्व है। अन्यथा हम मुक्त हो जायेंगे।
श्मशान में बैठा एक डोम इंतजार कर रहा होता है कि किसी की मृत्यु हो और पार्थिव शरीर आये। पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर इंतजार में होता है कि कोई पुलिस केस की बाड़ी आये। केमिस्ट् इंतजार में होता है कि लोग बीमार हो और दवा की बिक्री बढ़े। इसीलिए फार्मा स्युटिकल कम्पनियों ने कोरोना फैलाया ताकि दवाएं और वैक्सीन की बिक्री बढ़े। हर तरफ से दुःख की दुआएं मांगी जा रही हैं। ऐसे में भगवान को दोषी ठहराया नहीं जा सकता। भगवान को अपने सभी भक्तों की इच्छा पूरी करनी है। वह भी इसीलिए तथास्तु कह रहे हैं।
अमेरिका भी पूरे विश्व की बर्बादी चाहता है ताकि वह सुपर पावर बना रहे।
https://youtube.com/shorts/sUMEbL195aI?si=v5jpbullOLRaWE-7
राही मनवा दुःख की चिन्ता क्यूं सताती है --
ज़िन्दगी तो बेवफा है मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी।

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