अमीरों की व्यथा कथा

गरीब, गरीब क्यों है, क्या इसपर कभी कोई विचार किया जाता है ?
अम्बानी ने अपने बेटे की शादी में पैसा खर्च किया तो सारे देश ने उनकी भरपूर आलोचना की। किन्तु मैं तो बहुत प्रसन्न हुई कि देश में कोई इस काबिल है कि इतना पैसा कमा सकता है। अम्बानी की आलोचना का नतीजा था कि अडानी ने अपने बेटे की शादी में खर्च न करके सारा पैसा दान कर दिया। दान करना बहुत अच्छा है लेकिन इतनी मेहनत करके कमाने वाले को क्या इतना भी अधिकार नहीं है कि वह अपने पैसे को उपयोग करके खुश हो सके? अगर हमें अपनी मेहनत की कमाई का आनन्द लेने का अधिकार ही नहीं होगा तो हम मेहनत क्यों करें ? स्वर्गीय रतन टाटा जी की बहुत तारीफ की जाती है कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई सारी दान कर दी गरीबों के लिए। लेकिन मेरी तो अंतरात्मा यही कहती रही कि काश उनका भी परिवार होता और वह भी अम्बानी की तरह अपने बेटे बेटी की शादी में खुशी से नाचते। कितना अच्छा लगता है जब पूरा अम्बानी परिवार खुशी से नाचता है। उन्होंने इसके लिए जी तोड मेहनत की है। उन्हें इसका अधिकार है। खुशी ईश्वर ने उन्हें उनके शुभ कर्मों के फलस्वरूप बख्शी है। सरकार को गरीबों को बताना चाहिए कि वे क्यों गरीब है और अम्बानी, अडानी, टाटा क्यों अमीर हैं। अम्बानी परिवार ने केवल शादी की तैयारी के लिए तीन महीने से ज्यादा समय तक भरपूर मेहनत करके इतना अच्छा इंतजाम किया। एक गरीब अगर उनके द्वारा की जाने वाली मेहनत का दस प्रतिशत भी करें तो वह कभी गरीब नहीं रहेगा।
दूसरी बात है, जीवन की योजना यदि गरीब, अमीरों की तरह बनाए तो वे कभी गरीब नहीं रहेंगे। एक गरीब के बेटे की शादी अमूमन पंद्रह साल तक कर दी जाती है। उस उम्र तक वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होता है। पत्नी के आने के बाद उसका खर्च दो गुना हो जाता है। शादी के पांच साल के अंदर उनके दो तीन बच्चे हो जाते हैं। अब खर्च पांच गुना बढ़ जाता है और कमाई शायद ही एक आदमी की होगी। ऐसे में गरीब सरकार से अपेक्षा करता है कि सरकार उसका खर्च वहन करे। और सरकार मध्यम वर्गीय लोगों की उपेक्षा करके, निम्न वर्गीय लोगों का भार वहन करती है जिसका सारा दारोमदार उच्च वर्गीय लोगों को जाता है। उन्हीं के टैक्स के पैसे से सरकार गरीबों के लिए योजनाएं लाती है।
https://youtu.be/S3k93yeH2r0?si=XH1eTxr7Y4dVTrY2
भारत में सौ करोड़ से ज्यादा गरीब हैं। इनकी जनसंख्या इतनी ज्यादा क्यों है ? अगर गरीब मजबूर है तो उसे अपनी मजबूरी के मद्देनजर अपनी जिम्मेदारियों को कम से कम रखना चाहिए। अगर हम स्वयं का खर्च वहन नहीं कर सकते तो हमें शादी करके अपनी जिम्मेदारियों को दुगुना करने का क्या अधिकार है। अमीर व्यक्ति क्या अपने बेटे बेटी की शादी इस तरह से करते हैं ? जबकि उनके पास पर्याप्त धन होता है कि वह अपने बेटे बेटी का खर्च वहन कर सकते हैं। लेकिन वे अपनी जिम्मेदारियों को घटाने में विश्वास रखते हैं न कि बढ़ाने में। एक झलक अमीरों के बच्चो का :
https://youtube.com/shorts/u8w3DaYY0EM?si=eYzc_Yrw9EQhPoBs
https://youtube.com/shorts/NjDSR4lJQio?si=dr0Cv2lvvbwH2p2x

गरीबों के दस से बारह साल के बच्चे गली में दिनभर खेलते नजर आते हैं जबकि अमीरों के नवजात शिशु को भी स्कूल जाना पड़ता है। अगर मेहनत का दर्द सहने के लिए तैयार हो तो गरीबी का दर्द नहीं सहना पड़ता। जब हम मेहनत का दर्द नहीं सहना चाहते और जीवन को केवल अपनी खुशी को केंद्र में रखकर जीना चाहते हैं तभी गरीबी का दंश झेलना पड़ता है। अपने सुख के अनुसार दिनचर्या चाहिए। कम उम्र में दाम्पत्य एवं संतान सुख चाहिए। नशा पानी में धुत्त रहने को चाहिए। लगभग हर मजदूर दिन में अधिकांश पैसा गुटका तंबाकू सिगरेट शराब पर खर्च करता है। जबकि उसकी आय उसे इसकी अनुमति नहीं देती। और नशा करके, मारपीट करके ये लोग समाज में अव्यवस्था पैदा करतें हैं। अमूमन एक मजदूर पंद्रह से बीस हजार रूपए कमा लेता है और अगर सपत्नीक काम करता है तो तीस से चालीस हजार तक कमा सकते हैं। लेकिन इनका जीवन नियोजित नहीं होने के कारण ये स्वयं भी परेशान होते हैं और देश के लिए भी समस्या खड़ी करते हैं।
ऐसे में सरकार का दायित्व इन्हें जीवन नियोजिन सिखाने का है न कि इनकी जिम्मेदारी उठाने की। गरीबों को चाहिए कि वे अमीरों से सीखें कि अमीर कैसे बन सकता है न कि अमीर अपनी मेहनत की कमाई उन्हें बैठे बिठाए उपयोग के लिए दें।
सरकार की इसी गरीब केन्द्रित नीति की वजह से, अमीर देश छोड़कर जा रहें हैं। 
नेताओं को पैसे लेकर वोट देने वाले गरीब ही होते हैं और नेताओं की ग़लत नीतियों का शिकार भी सबसे ज्यादा गरीब ही होते हैं।
https://youtu.be/uqI6M16M6iM?si=ZHw2oPZFoilokjcA   
जनता ही पीड़ित है और जनता ही गुनहगार भी है। जनता द्वारा अपना मत देकर सरकार बनाई जाती है और सरकार ही संविधान और न्यायपालिका को नियंत्रित करती है।
आपको यदि लेबर प्लम्बर इलेक्ट्रीशियन इत्यादि की आवश्यकता हो तो हफ्तों से महीनों तक इन्तजार करना पड़ता है लेकिन एक प्रोफेसर और डाक्टर इंजीनियर के लिए एक पोस्ट पर पांच सौ तक लोग उपस्थित हो जातें हैं। ऐसे में ये कहना कि इनके पास आय का स्रोत नहीं है, बेमानी है। इनके लिए, पैसे कमाना, उच्च एवं मध्यम वर्ग की तुलना में ज्यादा आसान होता है।
https://youtu.be/baanWHMPIxU?si=XqT7JCfvkD55oi2U

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